तिल्दा-नेवरा । तिल्दा-नेवरा में कराहती मानवता: उद्योग की चिमनियों के धुएँ में घुटते श्रमिक अधिकार, तिल्दा-नेवरा की धरती इन दिनों सिर्फ धुआँ ही नहीं उगल रही, वह कराह भी रही है। औद्योगिक चिमनियों से उठता काला गुबार मानो एक सच्चाई को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहा है — उस सच्चाई को, जिसमें श्रम का पसीना सूखने से पहले ही इंसानियत की नमी सूखती दिखाई दे रही है। क्षेत्र के ग्राम परसदा में संचालित नंदन स्मेटल्स पर लगे आरोपों ने व्यवस्था की संवेदनहीनता को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
कहानी किसी एक मजदूर की नहीं, उस वर्ग की है जो भोर से पहले उठता है और रात ढलने के बाद घर लौटता है— इस भरोसे के साथ कि उसकी मेहनत से न सिर्फ उद्योग, बल्कि उसका परिवार भी फले-फूलेगा। परंतु विडंबना देखिए, बारह घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद जब ग्राम निनवा निवासी मंतूराम साहू जो कि नंदन स्मेटल्स उद्योग में शिफ्ट इंजार्च फीटर के रूप में कार्यरत था ,जो बारह घंटा के ड्युटी के पश्चात फैक्ट्री गेट से कुछ कदम ही आगे बढ़ा, तो किस्मत ने उसे दुर्घटना के अंधेरे में धकेल दिया। आज वह अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी की डोर थामे पड़ा है, और उसका परिवार उम्मीद व असहायता के बीच झूल रहा है।
परिजनों की आँखों में सिर्फ आँसू नहीं, सवाल भी हैं। सवाल यह कि यदि श्रमिकों का ईएसआई सुनिश्चित किया गया होता, यदि पीएफ की नियमित कटौती होती, तो क्या आज इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ता? क्या सामाजिक सुरक्षा कानून सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं?
सूत्र बताते हैं कि हाल ही में श्रम विभाग की जांच में मजदूरी दर की विसंगतियों और औद्योगिक अधिनियम के उल्लंघन की बातें सामने आई थीं। मुकदमा दायर होने की खबर भी आई। पर क्या इतना भर काफी है? यदि अनियमितताएँ उजागर हो चुकी थीं, तो सुधार का सूरज क्यों नहीं उगा? क्यों शोषण की छाया और गहरी होती चली गई?
क्षेत्रवासियों के मन में एक टीस है—क्या निरीक्षण महज औपचारिकता बनकर रह गया है? क्या विभाग की सख्ती कागजों तक सीमित है? या फिर कहीं न कहीं व्यवस्था की चुप्पी ही शोषण को साहस दे रही है?
यह घटना किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि श्रम और पूँजी के बीच बढ़ती खाई का प्रतीक है। जिस उद्योग को मजदूरों ने अपने खून-पसीने से सींचा, वही उद्योग आज उनके जीवन के संकट में मौन क्यों है? क्या विकास की इमारत इतनी निर्मम हो सकती है कि उसकी नींव में दबे हाथों की कराह भी सुनाई न दे?
तिल्दा-नेवरा की जनता अब मौन नहीं है। चौपालों से लेकर बाजार तक एक ही चर्चा है—न्याय कब मिलेगा? श्रमिक की सुरक्षा और सम्मान का हक कब सुनिश्चित होगा?
मानवता का तकाजा है कि शासन-प्रशासन इस मामले को संवेदनशीलता और दृढ़ता से देखे। क्योंकि यदि श्रमिक असुरक्षित है, तो विकास का हर दावा खोखला है। और यदि इंसानियत ही घायल हो जाए, तो उद्योग की चमक भी धूमिल पड़ जाती है।

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